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Tuesday, August 22, 2017

खर्राटे

प्रकाळ है प्रचंड है
जो छेड़ता मुझको सदा
अजब सा ये द्वन्द है
जिसने उडा दिया नींदों को मेरी
ख्याति जिसकी आबाद है
चित्र-गूगल आभार 
वो कोई मेरी प्रियतमा नहीं
बल्कि तेरी नाक का शंखनाद है
मैं खुश हूँ तेरे बात पर
सृष्टि के इस आधार पर
बस एक पीड़ा रही
कौन रात छोड़ जाता
ढोल तेरे नाक पर
धडम-धडम करता है जो
रात तांडव मैं करता अहो
चीर तेरी नींद को
अरे! देखो जरा इस दीन को
बिन नींद आँखें लाल हैं
तुझे आभास क्या मेरा हाल है
लोग पूछते मुझसे सदा
ये हाल तूने क्या रखा
कैसे बताऊँ दुख की घड़ी
मेरी नींद पर जो आ पड़ी
न जगता हुँ,न सोता हूँ मैं
बस रात भर रोता हूँ मैं
देख मेरा घोर क्रन्दन
शान्त हो,लोग करते वन्दन
नज़र मेरी रुई पर पड़ी
कानों में ठूँस ले निशाचरी
फिर नींद मीठी आएगी
भले,ढोल तान तीखी गाएगी।
©युगेश


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Friday, August 18, 2017

अब कहने को रह ही क्या गया था दरमियाँ

PK फिल्म का एक dialogue आपसे साझा करता हूँ;जब PK अपने ग्रह वापस जा रहा होता है और Jaggu को एहसास होता है की PK के दिल में क्या चल रहा है...............
"उसने एक बार भी पलट कर नहीं देखा/शायद अपने आँशु छुपा रहा था/कुछ सिख के गया बहुत कुछ सिखा के गया/झूठ बोलना सिख  कर गया और सिखा कर गया प्यार शब्द का सही मतलब/He loved me enough to let me go."
एक साधारण सा dialogue  जो अनसुना सा रह गया/पर गौर की जाए तो सच्चाई भी कितनी है/सच्चा प्यार  बस पाना नहीं होता बल्कि दूसरे की ख़ुशी के लिए वो एक चीज़ जो आपको बहुत अज़ीज है उसका खोना भी होता है.........

अब कहने को रह ही क्या गया था दरमियाँ
तुमने नज़रें जो झुका दी,लो मैं जान गया।
चित्र-गूगल आभार 
ये जो वस्ल की बातें हैं और अब मैं काफ़िर हूँ
कभी जो मोहब्बत से झुकी थी नज़रें,लो मैं जान गया।
तू मुझको अज़ीज थी,वो तुझको अज़ीज था
जो जरा सा इशारा हुआ,लो मैं जान गया।
मोहब्बत न नाचीज़ तेरी थी न नाचीज़ मेरी थी
ये जो शोरगुल क्या हुआ,लो मैं जान गया।
जिसे चाहो उसे पा जाना ही मोहब्बत नहीं
कभी खुशी के लिए छोड़ देना,लो मैं जान गया।
टूट जाऊँगा तुझे खोकर,ये बेकार की सोच है
टूट कर तुझे चाहा है और जीना,लो मैं जान गया।
माना कि किस्से मशहुर हैं हीर और राँझा के,हीर की एक मुश्कान को
किसी ने अपने अंदर के राँझा को भी दबाया होगा,लो मैं जान गया।
मोहब्बत न सही पर दोस्ती क्यूँ नहीं,ज़िन्दगी तो यूँ ही चलेगी
तू भी जान ले,मैं तो जान गया।
©युगेश
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मैं जोड़ लूंगा,छोड़ दे

ये तिलिस्म अपना तोड़ दे
क्या कर सकेगा छोड़ दे
ये रूह टूटी ही सही
मैं जोड़ लूंगा,छोड़ दे।

मैं कर्ण सा बलवान हूँ
बिखरा हुआ पर अभिमान हूँ
चित्र-गूगल आभार 
जिसने दे दिए कवच और कुंडल
बिखरा सही पर दयावान हूँ।

हुंकार की आधार पर
तेरे खोकले अहँकार पर
जा ढूँढ़ ले डरते हैं जो
मैं जीता अपने अभिमान पर।

ये लोक नीति ही नहीं
ये शोक नीति ही नहीं
जा पूछ ले जिससे भी हो
विनती किसी से की नहीं।

उपकार के उस हर्ज पर
रख हाँथ मेरे नब्ज़ पर
उभरूँगा फिर तू देख ले
समुद्र-मंथन के तर्ज पर।
©युगेश
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Wednesday, August 2, 2017

मैं चिराग हूँ बुझता हुआ ही सही,मगर याद रहे

मैं चिराग हूँ बुझता हुआ ही सही,मगर याद रहे
तुम्हारे दिल-e-मकान को रौशन,हमने ही किया था।
 चित्र-गूगल आभार 
ये किसी और से तिश्नगी जायज़ है तुम्हारी,मगर याद रहे
मोहब्बत से रूबरू हमने ही किया था।
चली जाओ किसी गैर की बाहों में गम नहीं, मगर याद रहे
तेरे दिल की आवाज़ को धड़कन,हमने ही दिया था।
तुम आज भी बारिश में जरूर भीगती होगी,मगर याद रहे
तुम्हारे बदन पर उन बूँदों का एहसास,हमने ही दिया था।
तुम तो यूँ ही नादान सी निकल जाती थी उस गली में,मगर याद रहे
उस पायल की मीठी झनक को महसूस,हमने ही किया था।
आज जो ये दूरियाँ हैं,बंदिशें ही सही,जो भी हो,मगर याद रहे
कुछ दर्द हमने लिया था,कुछ दर्द तुमने दिया था।
आज जो पहुँचा हूँ इस मक़ाम पर,खुश हूँ,मगर याद रहे
समेट रहा हूँ खुद को,थोड़ा टूटा था,बिखेर तुमने दिया था।
©युगेश
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Friday, July 14, 2017

शादी या कैरियर

जीवन के पड़ाव का जब २५वाँ वसंत आता है तो आपकी आक़ांक्षाएँ बदलने लगती हैं/ नौकरी और शादी दो ऐसे ज्वलंत विषय बन जाते हैं जो की ना केवल आपको बल्कि आपके माता-पिता,रिश्तेदारों सभी को बहुत परेशान करते हैं/ ऐसे में Donald Trump के राष्ट्रपति बनने पर जितना Mexico परेशान ना हुआ होगा उससे कहीं ज़्यादा परेशानी आपको हो जाती है बाकी रही सही कसर आस-पास के लोग पूरी कर देते हैं/ ऐसे में पनपता है विनोद.............

आज फिर हमारी शामत आयी
फिर घर में हमारी जो मामी आयी
आज फिर हमारे लिए रिश्ता लाया है
मुझसे कहा बड़े मुश्किल से मनवाया है
मैंने कहा मुझे अभी पढ़ना है
बेटा यही तो जीवन गहना है
और बाकी सब तो यूँ ही चलते रहना है
मामी आपको ये पता नहीं
चित्र-गूगल आभार 
नौकरियाँ आजकल बड़ी मुश्किल से मिलती हैं
कभी IT सेक्टर में बूम था
आजकल वहाँ भी छटनियाँ चलती हैं
आप छोड़ो ये सब
मुझे देना है अपने कैरियर को दिशा-निर्देश
अगर ये रिश्ता छोड़ दिया तो पछताओगे युगेश
तुम्हे पता है लड़की सुशील है सुंदर है
और तो और उसके पिताजी मिनिस्टर हैं
तब तुम्हारे पास वैभव होगा यश होगा
अरे! तरक्की इतनी की
कैशलेस के ज़माने में भी भर-भर के कैश होगा
और नौकरी की चिन्ता तो तुम छोड़ ही दो
IT सेक्टर की नौकरी न सही Bugatti जरूर होगा
मैंने कहा मामी ये ज्यादा हो गया
अरे! ठीक है कम से कम i20 तो होगा
इस मन-लुभावन भविष्य के झूले में
मैं भी मन ही मन खूब झूला
पर अचानक से झूले से गिरा
और यथार्थ में खुद को तौला
सामने लगे आईने पर मैंने अपना प्रतिबिम्ब देखा
क्या कहूँ मैंने खुद को थोड़ा बौना देखा
इसका तनिक आभास मुझे झकझोर गया
और इस मन-लुभावन रिश्ते को
मैं बनने से पहले तोड़ गया
मुझे लगा मामी अब नाराज़ हो जायेंगी
पर देखो ये अट्टाहास
किसे पता था मामी मुस्कुराएँगी
कहा चलो ये किताबें ऐसे ही नहीं रखी हैं
कुछ अच्छी बातें तुम्हारे दिमाग में भी धँसी हैं
खैर थोड़ी जल्दी करना
वरना तुम्हारे ये बाल उड़ जाएँगे
बताओ फिर अच्छे रिश्ते कहाँ से आएँगे
मामी आप चिन्ता न करें
मैं जल्द ही अच्छी सी नौकरी पाउँगा
और जब तक शादी न हो
बालों में बाबा रामदेव जी का
शुद्ध,चमत्कारी,अविश्वसनीय
केश कांति तेल लगाऊंगा।
©युगेश
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Friday, July 7, 2017

ठहर जाने दो पानी की इन छींटों को

ठहर जाने दो पानी की इन छींटों को चेहरे पर
कि ये मुझे ऐसे ही अच्छे लगते हैं
इनका गिरना,फिसलना,भटकना
मेरी तेरी आँख मिचौली से लगते हैं
चित्र- गूगल आभार 
ये बूँदें जो तुम्हारे लाली को समेटते हुए
उसके भार से गिरने को आमद हों
बता देना मुझे,मैं हथेली पर रख लूँगा उन्हें
क्योंकि एहसास होगा उनमें तुम्हारा
एक ठंडक सी होगी जो तुम महसूस न कर सको
पर मुझे इल्म है उसका,उस सुकून का
जो ज़िद पर आ जाए वो बूँदें
और ठहर जाना चाहें रुकसार पर तुम्हारे
थोड़ी सी रहमत करना उन पर
मैंने सुना है सीपियों में मोती बनते हैं
आज देखना चाहता हुँ
सुना है बारिश के बाद हल्की सी धूप होती है
डर है मुझे कहीं चुरा न ले जाये ये सूरज
इन मोतियों को फिर से कोई नई माला गूँथने
सो उठा लिया मैंने उन मोतियों को अपने होंठों से
कि अब वो मेरा हिस्सा थी जिनमें तेरा हिस्सा था
और मुस्कुरा उठी तुम मेरी नासमझी पर
अचानक फिर से तुम्हारे चेहरे पर एक बूँद आ टिकी
और लगा दिए तुमने अपने गाल मेरे गालों पर
और ठहर गयी वो बूँद
अब मुझे धूप का इंतज़ार था
मोती के माले जो गूँथवाने थे सूरज से
जिसमे तेरा हिस्सा था,जिसमे मेरा हिस्सा था/
© युगेश 
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Tuesday, June 20, 2017

और केश सफेद हैं,कुछ तेरे कुछ मेरे

क्योंकि,हर प्यार का अंत बुरा नहीं होता/क्योंकि,कई प्यार का कोई अंत भी नहीं होता।कई प्यार की कहानियाँ शाहरुख खान की फिल्मों की तरह भी होती हैं।हालाँकि, उसमे स्विट्ज़रलैंड के मनोरम दृश्य नहीं होते पर होते हैं बहुत से मनोरम पल,जिसमे होती हैं कुछ खट्टी-मीठी यादें,और जी लेते हैं उन्हें एक दूसरे के हाँथ पकड़े।एक उम्र बीत जाती है उस प्यार को जिये हुए।हाँ, कुछ केश सफेद जरूर हो जाते हैं, पर चमक अब भी वही पुरानी रहती है-


जज्बातों के शैलाब को ओढे
मैं निकल पड़ा तेरे ख्वाब को ओढे
रास्ते में बिखर गई वो पोटली,और टूट गए
कुछ सपने,कुछ तेरे कुछ मेरे
दरख्तों के रास्ते जाती वो पगडंडी,याद है
पैरों के निशान पड़े थे,कुछ तेरे कुछ मेरे
वो स्पर्श था,आलिंगन था,प्रेम था
जज़्बात थे,कुछ तेरे कुछ मेरे
चित्र-गूगल आभार 
याद है जब ना समझी में तोहफे लेकर आया
तुमने पूछा कौन सा लूँ,ये भी तेरे वो भी तेरे
तुम्हारे सुंदर मेहंदी को बिगाड़ती मेरी आजमाईश
हमारे अटूट प्यार के बीच न आती
कुछ कमियाँ हैं, कुछ तेरे कुछ मेरे
मेरी गुस्ताखी के बाद भी जो बची थी वो खूबसूरत आकृतियाँ
तुमने पूछा और ये क्या हैं
ये अच्छाइयाँ हैं जो जोड़ती हैं हमें
बहुत कम हैं मेरे ,बहुत से हैं तेरे
बहुत कुछ जो देखा जिंदगी में कुछ सपने टूटते
पर बहुत से जीते
,मैंने तेरे और तुमने मेरे
जब भी दो राह आये जिंदगी की राह में
हाँथ पकड़े,तूने मेरे मैंने तेरे
आज अरसा बीता हम साथ हैं
पता है,केश सफेद हैं,कुछ तेरे कुछ मेरे
©युगेश
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Saturday, June 10, 2017

धीमे-धीमे जो उजले-काले बादलों में

धीमे-धीमे जो उजले-काले बादलों में पड़ती है
चित्र-गूगल आभार 
सूरज की लालिमा
वैसे धीरे-धीरे मेरे दिल मे उतरता है रंग तेरा
जिसके बहुतेरे रूप हैं
हर एक खास और हर एक बाकियों से जुदा
और बरस पड़ते हैं उस साल की पहली बारिश की तरह
फर्क बस ये है वो बारिश धरती को भिंगोती है
तो दूसरी मेरे रूह को
जो झर-झर कर आती हैं आसमाँ के रास्ते वो बूंदें
और इंतज़ार होता है धरा को
वैसे ही तुम्हारे टोह में तो मैं भी रहता हूँ
तुम्हारे कदमों की दस्तक वो बूंदें ही तो हैं
वो पायल की आवाज़ बूंदों की झर-झर ही तो हैं
जो बूंदें पड़ती हैं मिट्टी में
उसकी महक कितनी सौंधी होती है ना
आज मैंने तुम्हारी खुशबू चुराने की कोशिश की
पता है महक उतनी ही सौंधी थी/
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Thursday, May 25, 2017

कम्बख्त,इश्क़ में लग गए

"मोहल्ले के लौंडों का प्यार अक्सर इंजीनियर डॉक्टर उठा कर ले जाते हैं।"रांझना फिल्म का ये डॉयलोग तो आपके जेहन में होगा ही।practical life में यानी की असल जिन्दगी में प्यार काफी हद तक ऐसा ही होता है।अब हर लव स्टोरी तो srk की फिल्मों की तरह होती नहीं कि पलट बोला और लड़की पलट गई।असल जिंदगी में तो लड़की छोड़ उसके माँ-बाप,भाई, पुराना आशिक़ पता नहीं कम्बख्त कौन-कौन पलट जाते हैं बस वही नहीं पलटती।इन्ही बातों पर चुटकियाँ लेते मेरी कविता :

बेकार ही लतीफे हमने उन्हें सुनाए मियाँ
वो हँसती गईं, हम कम्बख्त फँसते गए।
इस मक्कार इश्क़ ने दिवालिया निकाला हमारा
चित्र -गूगल आभार 
वो तोहफे सँभालती गईं,हम कम्बख्त उधार में धँसते गए।
पकड़ लिया हमे बाग में उनके साथ इश्क़ लड़ाते हुए
वो तो अब्बा के साथ हो ली,कम्बख्त हमपे डंडे बरसते गए।
इन मक्कार दोस्तों की क्या बात करूँ, कहा था ध्यान रखना
इधर हम पीटते गए,कम्बख्त एक-एक करके खिसकते गए।
सुन फराज़ को हमने भी अपने हुनर को तराशा
हमे तो शायरी अच्छी लगी,कम्बख्त ये दोस्त हँसते गए।
आज सोचा था जी भर कर उठाएँगे उनके नाज़ औ नखरे को
जिक्र जो पुराने आशिक़ का हुआ,कम्बख्त दाँत पिसते रह गए।
आज तो निकाह का पूरा इरादा कर लिया था हमने
उसने कहा रिश्ता तय हो गया है हमारा,कम्बख्त ये बात कानों को डसते गए।
आज काफी दिन बाद दिखी वो गली में अपने मुन्ने के साथ,कहा देखो मामा
काहे के मामा,वो अपने रास्ते गए,कम्बख्त हम अपने रास्ते गए।
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Wednesday, May 17, 2017

मैं हूँ रज़िया बेग़म

This is perhaps the most difficult poem that I have written till now.yesterday,while I was browsing facebook,going through usual newsfeed I stumbled upon this unusual story shared by a renowned photographer GMB Akash of this lady of bangladesh who was forced into prostitution but eventually she found love in a disabled beggar.I was touched by the story and wrote this.This is her story :
मैं हूँ रज़िया बेग़म
मैं एक वैश्या हूँ
पता है,अब आप थोड़े संकोच में होंगे
पर इसमें कोई नई बात नहीं
उजाले में सब कुछ अच्छा लगना चाहिए
और मैं इस उजाले का नहीं
उस अँधेरे का हिस्सा हूँ
जिसे ये पाक़ समाज अछूत समझता है
पर जिस तरह प्यार के आगे धर्म नहीं आता
शायद जिस्म के आगे भी धर्म नहीं आता
अँधेरे में तो मुखौटे की भी जरूरत नहीं
जो लोग ओढ़ते हैं दिन के उजाले में
पता नहीं क्या उम्र है मेरी
मेरे माँ बाप कौन हैं
पर वो दिन जरूर याद है
जब मेरी रूह पहली बार रोयी थी
उसके बाद मैं हिस्सा थी इस दुनिया का
जिसे मैं चाह कर भी छोड़ न सकी
चित्र-गूगल आभार
क्योंकि मेरी अब अलग पहचान थी
हवस लोगों की जायज़ थी
आखिर मेरी पहचान यही थी
मेरी मदद को लोग हाँथ जरूर बढ़ाते
पर वो हाँथ हर बार अपनी हद पार करते
मैं बिखर चुकी थी
पर फिर मैंने संजोया था खुद को
"टुम्पा" मेरी बेटी एक गाँठ थी
जिसके सहारे मैंने बिखरी हुई रजिया को बाँधा था
जब भी रात को खुद को तोड़ कर
अपने गुजारे को चंद पैसे जोड़ने जाती
मेरी बेटी मुझसे पूछती
जवाब मेरे पास होता नहीं
बस कहती मैं,मुझे भी ऐसे जाना पसंद नहीं
और लिपट जाती वो मुझसे
एक यही स्पर्श था जिसमें सच्चाई थी
पर वो दिन अजीब था
बादलों की गड़गड़ाहट,तेज़ हवा
मौसम खराब हो चला था
मानो अपने आगे सबको बिखेर दे
पर मुझे इसका भय कहाँ
मुझमें और कुछ बिखेरने को अब रह कहाँ गया था
पर डर था मुझे अपनी बच्ची का
मैं चीख रही थी
पीछे कुछ आहट थी
किसी के जोर से खाँसने की आवाज़ आयी
वो एक भिखारी था
मैंने कहा मेरे पास देने को पैसे नहीं
उसने आगे बढ़ कर मुझे 50 टका दिया
और फिर वापस हो गया
अपनी व्हील चेयर घिसकाते हुए
हाँ,वो लाचार था पैरों से
पर विचारों से नहीं
उसके पास जो भी था जरा सा
उसने मुझे दिया बिना किसी उम्मीद के
और जल्दी निकल जाने का मशवरा
उस दिन मैं खूब रोई
आज किसी ने पहली बार
उस छिछले रूह पर मरहम लगाया था
मुझे पहली बार प्यार का एहसास हुआ
मैंने हिम्मत बटोरी
क्योंकि इतना आसान नहीं होता
एक वैश्या को प्यार होना
और समाज का उसे समझ पाना
मुझे पता चला उस पर भी जिंदगी की मार पड़ी थी
कमज़ोरी किसी को पसन्द नहीं
उसकी पत्नी को भी नहीं थी
पर वो उसके मज़बूत दिल को न देख पाई
जिसे मैंने देखा था
उस घनघोर अँधेरे में
मैंने उस से कहा
कि मैं इतनी बिखर चुकी थी
की शायद उसे प्यार न कर सकूँ
पर हाँ जिंदगी भर उसकी बैसाखी जरूर बन सकती हूँ
उसने मेरी ओर देख कर कहा
बैसाखी बनने को प्यार होना चाइए
आज 4 साल होने को आये उस दिन को
खुशी है मुझे मैंने हिम्मत की
आज मैं एक औरत हूँ
हाँ,पेट कई बार खाली रह जरूर जाता है
पर अब्बास मियाँ ने अपना वादा नहीं तोड़ा
अरसा हुआ मैं रोयी नहीं
न ही अब कोई घुटन सी होती है/

Note:The link to the story shared by GMB Akash is
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1428832907181459&substory_index=0&id=260876280643800


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Monday, April 17, 2017

अंतर्द्वन्द

अंतर्द्वन्द जो सीने में बसा
औचित्य जीवन का मैं सोचता
यहाँ हर कोई मुझे पहचानता है
मैं पर खुद में खुद को ढूंढता

साँस चलती हर घड़ी
प्रश्न उतने ही फूटते
जो सपने बनते हैं फ़लक पर
धरा पर आकर टूटते

कुंठित होकर मन मेरा
चित्र-गूगल आभार 
मुझसे है आकर पूछता
जिसने देखे सपने वो कौन था
और कौन तू है ये बता

रो-रो कर मुझसे बोलती है
मानव की ये त्रासदी
वो बनना चाहता है कुछ
और बन निकलता और कोई

कौतुहल विचारों में
एक सैलाब जिसे मैं रोकता
जो हारता न किसी और से है
वो बस स्वयँ से हारता

मझधार में कश्ती हमारी
एक सवाल हमसे पूछती
इस ठौर चलूँ उस ठौर चलूँ
मन को हमारे टटोलती

विचार कर जो एक तो
आज या कल मंज़िल को मैं पाऊँगा
वरना यही मझधार है,कस्ती यही है
शायद अनचाही मंज़िल यही
कल मैं औरों को,खुद को
बस कोसता ही जाऊँगा/
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Friday, March 31, 2017

सुना है टपकते हैं जाम तेरी आँखों से

सुना है टपकते हैं जाम तेरी आँखों से
हमें तो बस एक कतरे की ख्वाईश है/
आजकल उखड़ा-उखड़ा रहता है दिल हमारा
चित्र-गूगल आभार 
इस नादान को बस एक आवाज़ की गुंजाईश है/
ये हया,ये खूबसूरती हम तो हार ही जाते हैं
जरा सुनो!ये बेकार की आजमाईश है/
कल जो निकलो बाज़ार में जुल्फें खुली रखना
बस इतनी सी तेरे चाहनेवाले की फ़रमाईश है/
दिल दे न देना किसी की मुफ्लिशी को देख कर
अय्यार हैं,ये तो झूठ की नुमाईश है/
जाओगी जहाँ भी,हमे वहाँ पाओगी
ये थोड़ी उसकी रेहम बाकी हम और हमारे दोस्तों की साजिश है/
उस फ़िज़ा में घुले तेरी खुशबू में लोग बहक जाते हैं
जाने क्या असर होगा वो तेरी खुशबू जो खालिश है/
कभी फुर्सत में हो तो आना ए दोस्त मेरी शोहबत में
तो बताऊंगा वो बारिश है और मुझे भींगने की ख्वाईश है/
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Tuesday, March 21, 2017

माँ का प्रेम

प्रेम की परिभाषा
इतनी आसान कहाँ
उपमाएं कम पर जाएं
जो माँ की बात हो
अकूत,विस्तृत,अपरिसीम
चित्र-गूगल आभार 
ये शब्द कम पड़ जाएँ
जो ममता की बात हो
प्रेम कभी महसूस कर आता है
प्रेम कभी साथ जीकर आता है
उस प्रेम की क्या बात करूँ
जो जीवन देकर आता है
एक प्रतिबिम्ब सा बनता है
माँ की उन आँखों में
जो है भी और नहीं भी
पर जीता उसकी साँसों में
वेदना परस्पर प्रेम
दृश्य मनोहर वो होता है
जब उस रोती माँ के हाँथों में
एक नवजीवन जब रोता है
दृश्य वो विशाल
पर अब उसकी छोटी दुनिया होती है
उस नन्हे बालक के खुशियों में
वो खुशियां ढूंढा करती है
झंकृत करती जीवन उसका
अपने मन-वीणा के तारों से
जो और न समझे ,वो गुत्थी सुलझी
माँ पढ़ती उसके आँखों से
चित्र उकेरती है जो वो
छोटा सा उसका साम्रज्य है
वो रानी है आभास नहीं
पर नन्हा उसका राजकुमार है/
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Wednesday, February 22, 2017

आज फिर लिखने का ख्याल आया

कल यूँ ही गुलज़ार की नज़्में सुनने का मन हुआ।ये गुलज़ार के लेखन की जादूगरी ही है कि बेजान से शब्दों में जान फूँक दे।वे छोटी से छोटी बातों को इतने विस्तार से इतने करीने से कहते हैं कि दिल को छू जाती है।कल्पना शक्ति दौड़ने लगती है और अल्फ़ाज़ों के जुगुनू से जगमगा उठते है वे पन्ने जहाँ आपके कलम की स्याही पड़ती है।उस पर भी उनके बोलने का अंदाज़ दिल को छू जाता है,ऐसे में ख्याल आता है कुछ लिखने का,हालाँकि उनके जैसा क्या ही लिखूँगा पर कोशिश तो होती रहनी चाइए।शायद कुछ जुगनू हमारे पन्नों पर भी आ जाएँ.......


आज फिर लिखने का ख्याल आया
जाने क्यों फिर तेरा नाम आया
अल्मारी से मैंने वो पुराना प्रेम पत्र निकाला
हमारे प्रेम की तरह उसे भी अधूरा पाया
धूल शायद पड़ी थी उन खतों में
चित्र-गूगल आभार 
उजले गुज़िश्ता का हमने धुंधला मुस्तक़बिल पाया

बो दिए थे दिल की ज़मीन में यादें कई
अरसा हो गया न उसमे खाद न पानी डाला
आज देखा तो एक पौधा पाया
आज फिर जज़्बातों को जगा पाया

वो बागीचा जहाँ हमने कितना वक़्त बिताया
वो पगडंडी जो हमे पहचानने लगी थी
आज फिर हमने उन फूलों को निहारा
जायज़ है महक थी,पर तुझसा महकता न पाया

याद है जब हम बारिश में भींग रहे थे
तुम्हारी जुल्फों से रिश रहे थे वे शरारती बूँदें
और आकर टिक जाते थे तुम्हारे रुखसार पर
तुम्हारा चेहरा मानो कैनवास सा बना लिया था
तुम उन्हें अपने दुप्पटे से पोंछते रही और
मुझे उनके तुम्हे छूने का अन्दाज़ पसंद आया

जो बैठा रहता हूँ बालकनी में तो सोचता हूँ
जो आहट हो,उस बेगैरत गली को तकता हूँ
जानता हूँ फ़िज़ूल है,पर फिर भी इंतज़ार आया
अरसा हुआ सुकून को,न ही इत्मिनान आया

भूलना होता तो शायद भूल ही जाते
हालाँकि कोशिश-ए-पैहम हमने कम नहीं की
पर जब भी की तेरा मासूम सा चेहरा जेहन में आया
और हर बार हमने खुद को कोशिश-ए-नाकाम पाया
और बस यूँ ही आज फिर लिखने का ख्याल आया
जाने क्यूँ फिर तेरा नाम आया।
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Wednesday, February 15, 2017

युवा और गाँधी

मैं खोया था बैठा उदास
निज आ बैठे गाँधी सुभाष
इस मन कौतुहल और आँधी को
कैसे समझाऊं गाँधी को
शायद समझे वो महापुरुष
चेहरे पर थी मुस्कान दुरुस्त
सुभाष समझाओ युवा साथी को
हमने देखा भांति भांति को
याद है प्यारा खुदीराम
चित्र -गूगल आभार 
और अमर माँ को उसका प्रणाम
जो जलते इस यौवन में
रोष भरा जिसके क्रन्दन में
जो पथ न धूमिल होने देता है
लोहा तब तपकर कुंदन होता है
विकृतियाँ भरी धरातल पर
पर हमने खुद को सहज रखा
भारत माँ की भूमि को
अमर सपूतों ने सींचा
जो बातें तुमको भटकाती है
और चमक तुम्हे ललचाती है
याद रखो माँ की ख्वाईश
वो कितना तुमको चाहती है
जो विषम होती परिस्तिथी तो
ह्रदय तुम विशाल करो
जो हारे मन ठोकर से तो
किञ्चित और प्रयास करो
सुलझेंगे सारे अनसुलझे
नवचेतना से प्रहार करो
हमपर भले न सही
पर निज शक्ति पर विश्वास करो
सफलता असफलता को छोड़ो
करने दो लोगों को बातें
प्रयास वो पहली सीढ़ी है
वही मनुज कुछ कर जाते
तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हे आज़ादी दूँगा
बात सहजता से कर देखो
इतने हाँथ उठे थे
उम्मीद की लौ जलाकर तो देखो
प्रकाश सा फैला आँखों में
मैंने हाँथ बढ़ाकर देखा
मिलना हुआ जो उनसे
शायद सपनों का धोखा
ज्ञान हुआ तब जा मुझको
भ्रम का अब न कोई साया था
इस भ्रमित युवा मन में
नवचेतना का प्रवाह आया था/
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Wednesday, January 4, 2017

अलगाव

शाखों से पत्ते टूट गए
आँखों से दो मोती छूट गए
तुम हमसे हम तुमसे क्या रूठे
उधर तुम टूट गए
इधर हम टूट गए

दिलों में जज़्बात अब भी वही थे
रवानगी मोहब्बत की अब भी वही थी
वहम का झोंका फ़िज़ा में क्या फैला
झूठ को सच तुम मान गए
इधर भरोसा हम हार गए

दिल की कहानी को बयां करते करते
हम टूट गए तुमसे वफ़ा करते करते
शक का बीज पता नहीं कब बोया
कभी अपनी सुबक से तुम सींच गए
कभी अपने आंशुओं से हम सींच गए

वारफ्तगी मेरे इस दिल की
शोख़ आँखों की मेहकशी की
अब कभी कोई बातें नहीं होती
अरसा हो गया,मोहब्बत मुझे जताये हुए
और तेरा मुझसे नज़र चुराये हुए

एक लंबी ख़ामोशी है हमारे बीच
चंद फैसलों ने फासला तय कर दीया
बातें बहुत सी हैं पर बयाँ नहीं होती
कभी एक-दूजे को अनदेखा हम कर गए
कभी निकलते जज़्बातों को चंद हम कर गए।
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