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Wednesday, May 17, 2017

मैं हूँ रज़िया बेग़म

This is perhaps the most difficult poem that I have written till now.yesterday,while I was browsing facebook,going through usual newsfeed I stumbled upon this unusual story shared by a renowned photographer GMB Akash of this lady of bangladesh who was forced into prostitution but eventually she found love in a disabled beggar.I was touched by the story and wrote this.This is her story :
मैं हूँ रज़िया बेग़म
मैं एक वैश्या हूँ
पता है,अब आप थोड़े संकोच में होंगे
पर इसमें कोई नई बात नहीं
उजाले में सब कुछ अच्छा लगना चाहिए
और मैं इस उजाले का नहीं
उस अँधेरे का हिस्सा हूँ
जिसे ये पाक़ समाज अछूत समझता है
पर जिस तरह प्यार के आगे धर्म नहीं आता
शायद जिस्म के आगे भी धर्म नहीं आता
अँधेरे में तो मुखौटे की भी जरूरत नहीं
जो लोग ओढ़ते हैं दिन के उजाले में
पता नहीं क्या उम्र है मेरी
मेरे माँ बाप कौन हैं
पर वो दिन जरूर याद है
जब मेरी रूह पहली बार रोयी थी
उसके बाद मैं हिस्सा थी इस दुनिया का
जिसे मैं चाह कर भी छोड़ न सकी
चित्र-गूगल आभार
क्योंकि मेरी अब अलग पहचान थी
हवस लोगों की जायज़ थी
आखिर मेरी पहचान यही थी
मेरी मदद को लोग हाँथ जरूर बढ़ाते
पर वो हाँथ हर बार अपनी हद पार करते
मैं बिखर चुकी थी
पर फिर मैंने संजोया था खुद को
"टुम्पा" मेरी बेटी एक गाँठ थी
जिसके सहारे मैंने बिखरी हुई रजिया को बाँधा था
जब भी रात को खुद को तोड़ कर
अपने गुजारे को चंद पैसे जोड़ने जाती
मेरी बेटी मुझसे पूछती
जवाब मेरे पास होता नहीं
बस कहती मैं,मुझे भी ऐसे जाना पसंद नहीं
और लिपट जाती वो मुझसे
एक यही स्पर्श था जिसमें सच्चाई थी
पर वो दिन अजीब था
बादलों की गड़गड़ाहट,तेज़ हवा
मौसम खराब हो चला था
मानो अपने आगे सबको बिखेर दे
पर मुझे इसका भय कहाँ
मुझमें और कुछ बिखेरने को अब रह कहाँ गया था
पर डर था मुझे अपनी बच्ची का
मैं चीख रही थी
पीछे कुछ आहट थी
किसी के जोर से खाँसने की आवाज़ आयी
वो एक भिखारी था
मैंने कहा मेरे पास देने को पैसे नहीं
उसने आगे बढ़ कर मुझे 50 टका दिया
और फिर वापस हो गया
अपनी व्हील चेयर घिसकाते हुए
हाँ,वो लाचार था पैरों से
पर विचारों से नहीं
उसके पास जो भी था जरा सा
उसने मुझे दिया बिना किसी उम्मीद के
और जल्दी निकल जाने का मशवरा
उस दिन मैं खूब रोई
आज किसी ने पहली बार
उस छिछले रूह पर मरहम लगाया था
मुझे पहली बार प्यार का एहसास हुआ
मैंने हिम्मत बटोरी
क्योंकि इतना आसान नहीं होता
एक वैश्या को प्यार होना
और समाज का उसे समझ पाना
मुझे पता चला उस पर भी जिंदगी की मार पड़ी थी
कमज़ोरी किसी को पसन्द नहीं
उसकी पत्नी को भी नहीं थी
पर वो उसके मज़बूत दिल को न देख पाई
जिसे मैंने देखा था
उस घनघोर अँधेरे में
मैंने उस से कहा
कि मैं इतनी बिखर चुकी थी
की शायद उसे प्यार न कर सकूँ
पर हाँ जिंदगी भर उसकी बैसाखी जरूर बन सकती हूँ
उसने मेरी ओर देख कर कहा
बैसाखी बनने को प्यार होना चाइए
आज 4 साल होने को आये उस दिन को
खुशी है मुझे मैंने हिम्मत की
आज मैं एक औरत हूँ
हाँ,पेट कई बार खाली रह जरूर जाता है
पर अब्बास मियाँ ने अपना वादा नहीं तोड़ा
अरसा हुआ मैं रोयी नहीं
न ही अब कोई घुटन सी होती है/

Note:The link to the story shared by GMB Akash is
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1428832907181459&substory_index=0&id=260876280643800


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